सोमवार, 26 सितंबर 2011

हिन्दी साहित्य पहेली 48 काव्य -रचना का आधार

प्रिय पाठकजन एवं चिट्ठाकारों,

आप की पहेली जानने से पहले आपसे एक रोचक वृतांत की चर्चा करते हैं। किसी जंगल में एक सिद्ध महर्षि ऋषि रहते थे । उसी जंगल मे एक निषाद भी रहता था जिसका व्यवसाय था पशु पक्षियों का आखेट करना। एक दिन जब वह निषाद शिकार पर निकला तो उसने कूज पक्षियों के एक जोडे को देखा। यह जोडा काम क्रीडा में इतनी तन्मयता से मगन था कि वह निषाद के रूप में अपने पास आने वाले खतरे को भाँप न सका। निषाद ने अपने धनुष पर तीर से निशाना साधकर उस तन्मय क्रूज पक्षी जोडे को घायल कर डाला। उसी समय संयोगवश वहाँ वे ऋषि महोदय भी आ पहुँचे और घायल पक्षी को देखकर द्रवित हो उठे। यह जानने पर कि उस निषाद द्वारा काम क्रीडा में लिप्त पक्षी को घायल किया गया है उन्होंने निषाद को शाप दे दिया और शाप स्वरूप उनके मुहँ से अनायाय ही ये शब्द निकल पडेः-


मा निषाद प्रतिष्ठामं त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत क्रौंचमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्


कालान्तर में उस महर्षि ने अपने शिष्य ऋषि भारद्वाज से इस घटना का उल्लेख किया और अनायास फूट पडी इन पंक्तियों को उद्घृत करते हुये यह कहा किः-

अब से इस प्रकार आठ-आठ अक्षरों वाले चार चरणों से बने इस छंद को ही श्लोक कहा जायेगा और यही काव्य -रचना का आधार होगा।


अब बात करते हैं आज की पहेली की तो आज की पहेली में आपको काव्य-रचना का आधार निर्धारित करने वाले उस आदि कवि महर्षि को पहचानना है।


आपकी सहायता के लिये संकेत है कि वह महर्षि मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्री राम के समकालीन थे।

अब अगर आप पहचान गये हों उस आदि-कवि महर्षि को तो तत्काल अपना उत्तर भेजें ताकि कोई और पहले उत्तर भेजकर इसका विजेता न बन जाय।

4 टिप्‍पणियां:

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